Ansoo

वह एक आंसू जो निकल चला
अपनी राह बनाये
क्या वह पूछता है
मुझे पोंछने कौन आये?
Voh ek aansu jo nikal chala
Apni raah baanaye
Kya voh poochhta hai
Mujhe ponchhne kaun aaye?

क्या वह जानता है
कि पलकों को लांघकर वो
सबको जता देता है
की रुह रही है रो
Kya voh jaanta hai
Ki Palkon ko laanghkar vo
Sabko jataa deta hai
Ki rooh rahi hai ro

इक पुकार निकल पड़ी है
न उठाये आवाज़ न करे शोर
दबाई न गयी लेकिन
ऐसा था उसका ज़ोर
Ik Pukaar nikal padi hai
Na uthhaye aawaz, na kare shor
Dabayi na gayi lekin
Aisa tha iska zor

क्या चाहती है यह
जो चली पड़ी है बिना डोर
कहाँ तक पहुंचेगी यह
इसका न है कोई ठोर
Kya chaahti hai yeh
jo chali padi hai bina dor
Kahaan tak pahunchegi yeh
Is ka na hai koi thor

राह में उसे मिलेंगे
कैसे अनजान मोड़
लुड़केगी कभी इधर कभी उधर
खोजती अपना छोर
Raah mein use milenge
Kaise anjaan modh
Ludakegi kabhi idhar kabhi udhar
Khojti apna chhor

क्या अंजाम होगा इसका
कहाँ निजात पाएगी
अकेले
यूँही सूख जायेगी
Kya anjaam hoga iska
Kahaan nijaat paayegi
Akele,
Yunhi sookh jaayegi

——-
फिर कभी/Phir Kabhi….

फिर कभी एक दिन उसका ज़िक्र करेंगे
जो उमड़ के बाढ़ बन आई
उसको क्या नज़रअंदाज़ करोगे
जो अपने साथ सैलाब लायी

(Phir kabhi ek din uska zikr karenge
Jo umadh ke baadh ban aayi
Usko kya nazarandaaz karoge
Jo apane saath sailaab laayi)

ककभी और उसके भी किस्से गाएंगे
जो नटखट सी बहे लचकायी
देर अकेली न रही
वोह नाज़ुक, नखरे की जाई

(Kabhi aur, uske bhi kisse gaayenge
Jo natkhat si bahe lachkaayi
Der akeli na rahi
Voh nazuk, nakhre ki jaee)

English Transliteration:

Voh ek aansu jo nikal chala
Apni raah baanaye
Kya voh poochhta hai
Mujhe ponchhne kaun aaye?

Kya voh jaanta hai
Ki Palkon ko laanghkar vo
Sabko bataa deta hai
Ki rooh rahi hai ro

Ik Pukaar nikal padi hai
Na uthhaye aawaz, na kare shor
Dabayi na gayi lekin
Aisa tha iska zor

Kya chaahti hai yeh
jo chali padi hai bina dor
Kahaan tak pahunchegi yeh
Is ka na hai koi thor

Raah mein use milenge
Kaise anjaan modh
Ludakegi kabhi idhar kabhi udhar
Khojti apna chhor

Kya anjaam hoga iska
Kahaan nijaat paayegi
Akele,
Yunhi sookh jaayegi

(Phir kabhi ek din uska zikr karenge
Jo umadh ke baadh ban aayi
Usko kya nazarandaaz karoge
Jo apane saath sailaab laayi)

(Kabhi aur, uske bhi kisse gaayenge
Jo natkhat si bahe lachkaayi
Der akeli na rahi
Voh nazuk, nakhre ki jaee)

Original:

वह एक आंसू जो निकल चला
अपनी राह बनाये
क्या वह पूछता है
मुझे पोंछने कौन आये?

क्या वह जानता है
कि पलकों को लांघकर वो
सबको जता देता है
की रुह रही है रो

इक पुकार निकल पड़ी है
न उठाये आवाज़ न करे शोर
दबाई न गयी लेकिन
ऐसा था उसका ज़ोर

क्या चाहती है यह
जो चली पड़ी है बिना डोर
कहाँ तक पहुंचेगी यह
इसका न है कोई ठोर

राह में उसे मिलेंगे
कैसे अनजान मोड़
लुड़केगी कभी इधर कभी उधर
खोजती अपना छोर

क्या अंजाम होगा इसका
कहाँ निजात पाएगी
अकेले
यूँही सूख जायेगी

——-
फिर कभी

फिर कभी एक दिन उसका ज़िक्र करेंगे
जो उमड़ के बाढ़ बन आई
उसको क्या नज़रअंदाज़ करोगे
जो अपने साथ सैलाब लायी

ककभी और उसके भी किस्से गाएंगे
जो नटखट सी बहे लचकायी
देर अकेली न रही
वोह नाज़ुक, नखरे की जाई

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