Satrangi Parivesha

Ek Jhoomta chala gaya
Dolta apni laya mein
Khel kood kuchh kar paaya
Kintu sthir apne dhyeye mein

Aur ek dekha mukh phulaye
Jaise Duniya ka bhaar uthaaye
Chhalakta uske andar se sab
Kuchh samete kuchh sambhalne ki talab

Phir ek guzara thoda durbal
Jaise use kuchh mila hi nahi
Par jaise lachak ke raha tha chal
Is rah par milega kuch to sahi

Isko to mila kala ka darja zaroor
Kya shaan, kya banavat ay huzoor
Kisi ne yeh itmenaan se banaaya
Jo le chale, usi ko sajaaya

Hamaara thaila to hai kuch adna
Bhare usmein donon hakeekat aur sapna
Zor se gaanth bandh rahe hamesha
Khule to satrangi parivesha

एक  झूमता  चला  गया

डोलता  अपनी  लय में

खेल  कूद  कुछ  कर पाया

किन्तु  स्थिर  अपने  ध्येय  में

और  एक  देखा  मुख  फुलाये

जैसे  दुनिया  का  भार  उठाये

छलकता  उसके  अन्दर  से  सब

कुछ  समेटे  कुछ  सँभालने  की तलब

फिर  एक  गुज़रा  थोडा  दुर्बल

जैसे  किसी  ने  कभी  उसे  भरा  ही  नहीं

पर  जैसे  लचक  के  रहा  था  चल

इस  राह  पर  मिलेगा  कुछ  तो  सही

इसको  तो  मिला  कला  का  दर्जा  ज़रूर

क्या  शान , क्या  बनावट  एय  हुज़ूर

किसी  ने  यह  इत्मीनान  से  बनाया

जो  ले  चले , उसी  को  सजाया

हमारा  थैला  तो  है  कुछ  अदना

भरे  उसमें  दोनों  हकीकत  और  सपना

जोर  से  गाँठ  बांध  रहे  हमेशा

खुले  तो  सतरंगी  परीवेषा

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