Asahaj

Jo kehte ho ki har boond mein bhanwar hota
Reg ki Trishna kahaan dekh paaonge
Aandhi jab uth banegi yeh
Bhanwar le dekhte reh jaaoge

Har bhanwar manthan nahin hota
Khaali jal chatpataoge
Lehron ka tamasha yeh
Dhaar ise na keh paaoge

Rang khela par yeh holi na hoti
Jo rangon ko alag dikhaoge
Ek rang ka khoon yeh
Garam hua to vyarth bahaaoge

Gadda hai, Gaddi mat samjho
Itna chad na paaoge
Mrigtrishna ke maare yeh
Sarovar Sukh kya de paaoge

जो  कहते  हो  कि  हर  बूँद  में  भंवर  होता

रेग  की  तृष्णा  कहाँ  देख  पाओंगे

आंधी  जब  उठ  बनेगी यह

भंवर  ले  देखते  रह  जाओगे

हर  भंवर  मंथन  नहीं  होता

खाली  जल  चत्पताओगे

लहरों  का  तमाशा  यह

धार  इसे  न  कह  पाओगे

रंग  खेला  पर  यह  होली  न  होती

जो  रंगों  को  अलग  दिखाओगे

एक  रंग  का  खून  यह

गरम  हुआ  तो  व्यर्थ  बहाओगे

गद्दा  है , गद्दी  मत  समझो

इतना  चढ़  न  पाओगे

मृगतृष्णा  के  मारे  यह

सरोवर  सुख  क्या  दे  पाओगे

My first attempt at political poetry. Again, draft version. Much will be changed, as my hair grows more white.

Advertisements

One thought on “Asahaj”

Comments are closed.