Kahaani ka pher

(This one again, is a work in progress.. a few bumps, a few rough edges, a pothole or two.. much to do)

Yaheen par basera daal,aankhen moond lein;

Ya phir kuchh kahaani dhoondne chalein

 

 

Yeh aadat hai talaash ki ya phir yoon

Ki, tassalli ke aaraam se ham mehroom

 

 

Banjar mein khwab mahalon ke beeje

Banjaare ban chale gar zameen na paseeje

 

 

Zameen jo sun bhi leti hamaari sadaa

Kya door ka baadal chhodta apni adaa?

 

 

Baadal jo kha leta ham par taras

Zaroor lag jaati kisi ki kaali daras

 

 

Khaali haath mile Khwaab jo boya,

Dil lagaaya, kucch na sanjoya

 

 

Lekar kahaani ka anaaj

Bin boye, fasal, dar, byaaj

 

 

Tijarat ke zamaane mein kahaani ka pher

Apne apne nazariya ka bun liya ter

 

 

यहीं  पर  बसेरा  दाल ,आँखें  मूँद  लें ;

या  फिर  कुछ  कहानी  ढूँढने  चलें

 

 

यह  आदत  है  तलाश  की  या  फिर  यूं

कि तस्सल्ली  के  आराम  से  हम  महरूम

 

 

बंजर  में  ख्वाब  महलों  के  बीजे

बंजारे  बन  चले  गर  ज़मीन  न  पसीजे

 

 

ज़मीन  जो  सुन  भी  लेती  हमारी  सदा

क्या  दूर  का  बादल  छोड़ता  अपनी  अदा ?

 

 

बादल  जो  खा  लेता  हम  पर  तरस

ज़रूर  लग  जाती  किसी  की  काली  दरस

 

खाली  हाथ  मिले  ख्वाब  जो  बोया ,

दिल  लगाया , कुच्छ  न  संजोया

 

 

हकीकत से मिलाने पर अमादा न होना

धूल चढ़ा हुआ माटी का खिलौना

 

 

लेकर  कहानी  का  अनाज

बिन  बोये , फसल , दर , ब्याज

 

 

तिजारत  के  ज़माने  में  कहानी  का  फेर

अपने  अपने  नजरिया  का  बुन  लिया  टेर

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